राहु बारहवें भाव में नीच होता है और उसका कारक भाव भी है तथा केतु छठे भाव में नीच होता है और उसका कारक भाव भी है।
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कुंडली में १२ भाव होते है और ९ राशि होती है। प्रत्येक ग्रह किसी एक राशी में उच्च स्थिति में होता है और उससे ठीक सातवे स्थान पर नीच स्थिति का होता है।
शनि की अशुभता निवारण करने वाला रत्न नीलम है। नीलम रत्न धारण करने से शनि की अशुभता कम हो सकती है अथवा बिल्कुल भी समाप्त हो सकती है।
यह तैंतीस अंकीय शनि यंत्र अति विशिष्ठ एवम् प्रभावकारी है। इस यंत्र की रचना लोहे अथवा जस्ते के पत्र अथवा भोजपत्र पर काली स्याही से करें।
शनि गोचर में परिभ्रमण करता हुआ जन्मराशि से बारहवें भाव में आता है तब वह वहां पर ढाई वर्ष तक निवास करता है बाद में वह जन्मराशि में ढ़ाई वर्ष रहता है और पुनः जन्म राशि से दूसरे भाव में ढाई वर्ष की अवधि तक रहता है। यही शनि की साढ़े साती है।
कुण्डली के प्रथम भाव में शनि और शुक्र की युति हो तो द्विभार्या योग बनता है। सामान्य सुख प्राप्त होगा।
शनि और गुरु के योग का फल | Shani Guru Yuti Fal कुंडली के बारह भावो में शनि और गुरु की युति का फल निम्न अनुसार है :-
कुण्डली के प्रथम भाव में शनि और बुध का योग हो तो जातक परोपकारी तथा सरल हृदय वाला होगा। सत्यभाषी होने के कारण उसे सम्मान तो मिलेगा किन्तु यदा-कदा अपयश भी प्राप्त होगा।
जातक को शनि चन्द्र योग ग्रह के प्रभाव से अपमानित एवम् संघर्षमय जीवन व्यतीत करना पड़ता है। जातक लम्बी आयु वाला संघर्षशील होगा।