प्रथम भाव में शनि के साथ सूर्य का योग होने पर धन की कमी, पारिवारिक कलह, संचित सम्पत्ति का नष्ट होना, उन्माद, अकर्मण्यता, रोग-व्याधि आदि का प्रभाव रहता है।
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कुण्डली में शनि की शुभ- दशा हो तो जातक कारोबार में लाभ, व्यावसायिक लाभ, अधिकारी होना या जातक गांव, नगर अथवा प्रदेश में विशिष्ठ पद प्राप्त करता है ।
शनि के श्रेष्ठ घर, मंदे घर, रंग, शत्रु ग्रह मित्र ग्रह, कार्य, व्यवसाय आदि की संक्षिप्त तालिका
लग्न को चन्द्रमा पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो जातक प्रवासी, व्यवसायी, भाग्यवान्, शौकीन, कृषण और स्त्रीप्रेमी होता है।
प्रथम भाव को सूर्य पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो जातक रजोगुणी, नेत्ररोगी, सामान्य धनी, साधुसेवी, मन्त्रज्ञ, वेदान्ती, पितृभक्त, राजमान्य और चिकित्सक होता है।
तृतीय स्थान से आजीविका का भी विचार किया जाता है। लग्न, चन्द्रमा और सूर्य इन तीनों ग्रहों में से जो अधिक बलवान् हो, उससे दसवें स्थान के नवांशाधिपति के स्वरूप, गुण, धर्मानुसार आजीविका ज्ञात करनी चाहिए।
उच्च ग्रह का शुभ प्रभाव हो सकता है कम, ध्यान रखे ये बाते
मन्त्र-व्याकरण में मन्त्र-समुदाय के दो प्रकार दिखाये गये हैं- आग्नेय मन्त्र और सौम्य मन्त्र। इनमें जो मन्त्र पृथ्वी, अग्नि और आकाश तत्व से युक्त होते हैं वे ‘आग्नेय’ कहलाते हैं तथा जल और वायु तत्त्व से युक्त होते हैं वे ‘सौम्य’ कहलाते हैं।
ताँबा की अंगूठी रविवार के दिन प्रातः काल गाय के दुग्ध व घृत में डुबोकर मंत्र जाप करता हुआ धारण करने से रवि ग्रह दोष निवारण होता है।
एक चन्द्रमास में शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष होते हैं। शुक्लपक्ष के अन्त में 15वीं तिथि को पूर्णिमा तथा कृष्णपक्ष के अन्त में 30वीं तिथि को अमावस्या कहते हैं।