सभी ग्रह ३।५।६।७।८।११ राशियों में हों तो अरिष्टनाश होता है।
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भाग्येश जब भाग्य-स्थान में हो तो व्यक्ति धनधान्य से युक्त होता है। उसे बहुत भ्राताओं से सुख मिलता है और वह गुणवान तथा रूपवान होता है।
जब अष्टमेश छठे अथवा बारहवें स्थान में हो तो व्यक्ति नित्य रोगी होता है। बाल्यावस्था में उसको जल तथा सर्प से भय होता है।
जब चतुर्थेश चतुर्थ स्थान में हो तो व्यक्ति मंत्री, धनवान, चतुर, शीलवान, अभिमानी, सुखी और स्त्रियों का प्रिय होता है।
जब तृतीयेश तीसरे स्थान में हो तो मनुष्य पराक्रमी, पुत्रो से युक्त, धनवान, अति प्रसन्न और अदभुत सुख का भोग करने वाला होता है।
जब धनेश धन-स्थान में हो तो व्यक्ति धनी, अभिमानी, दो या तीन स्त्री वाला और पुत्रहीन होता है।
जब लग्नेश लग्न में हो तो मनुष्य (जातक) उत्तम शरीर वाला, पराक्रमी, उदार, चंचल स्वभाव का, दो विवाह करने वाला अथवा परस्त्रीगामी होता है।
जब कर्मेश सुख अथवा कर्म-स्थान में हो तो व्यक्ति सखी पराक्रमी, गुरु तथा देवताओं की पूजा में तत्पर, धर्मात्मा तथा सत्य होता है।
कुंडली में प्रथमतः जो ग्रह शुभ दिखता है उसका फल कभी-कभी बिल्कुल नहीं मिलता क्यांकि वह ग्रह उस कुंडली में वास्तव में शुभ नहीं होता। बारह लग्नों के लिए शुभाशुभ ग्रह के अनुसार ग्रह का ज्योतिषीय फल कथन कहना चाहिए।
नीच और शत्रु ग्रह की दशा में परेदश में निवास, वियोग, शत्रुओं से हानि, व्यापार से हानि, दुराग्रह, रोग, विवाद और नाना प्रकार की विपत्तियाँ आती हैं। यदि ये ग्रह सौम्य ग्रहों से युत या दृष्ट हों तो बुरा फल कुछ न्यून रूप में मिलता है।