राहु की महादशा में राहु, बृहस्पति, शनि, बुध, केतु, शुक्र, सूर्य, चन्द्रमा एवं मंगल की अन्तर्दशा का फल
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सप्तमेश लग्न अथवा सप्तम स्थान में हो तो व्यक्ति परस्त्रियों में लम्पट, दुष्ट, चतुर, धैर्यवान और सदा वातरोग से युक्त होता है।
जब षष्ठेश सप्तम, लाभ स्थान अथवा लग्न में हो तो व्यक्ति कीर्ति गुणवान, धनवान, अभिमानी, साहसी और पुत्रहीन होता है।
राहु-केतु सहित सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि ये ९ ग्रह हैं। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन ये १२ राशियाँ है।
जब द्वादशेश धन-स्थान अथवा अष्टम स्थान में हो तो व्यक्ति विष्णु-भक्त, धर्मात्मा, प्रियवादी तथा सब अच्छे गुणों से युक्त होता है।
तिथियों को मुख्य रूप से पांच भागों में बांटा गया है। नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा। पहली तिथि यानी प्रतिपदा होगी नंदा, दूसरी भद्रा, तीसरी जया, चोथी रिक्ता और पांचवी पूर्णा।
मेष, तुला, धन और मकर इन चार लग्नों के अतिरिक्त यदि कोई लग्न हो तो अष्टमेश अशुभ फल ही करता है। ऐसा पराशर का मत है। ग्रह अपनी-अपनी दशा में अपना फल करते हैं।
केन्द्रेश और त्रिकोणेश का आपस मे सम्बन्ध होना ‘योग’ कहलाता है । ‘राज’ शब्द ऐश्वर्य-बोधक है इस कारण कुण्डली में कोई भी योग हो, यदि उसका फल शुभ, धनकारक, समृद्धि या उत्कर्ष करने वाला होता है तो उसे ज्योतिषियो की भाषा में राजयोग-Rajyog कहते हैं।
ग्रह के अस्त अवस्था तत्व एवं प्रभाव संबंधी विशेष जानकारी
जिसका पंचमेश नवम या दशम स्थान में हो, उसका पुत्र राजा के समान होता है अथवा ग्रंथकर्ता, प्रख्यात और कुलदीपक होता है।