कुंडली में १२ कोष्टक या घर को भाव कहते है। 1,4,7,10 केन्द्र, 5,9 त्रिकोण, 2,5,8,11 पणफर, 3,6,9,12 आपोक्लिम, 6,8,12 त्रिक, 3,6,10,11 उपचय, 1,2,4,5,7,8,9,12 कहलाते है
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राहु का दृष्टि फल – पाँचवें भाव को राहु पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो भाग्यशाली, धनी, व्यवहारकुशल और सन्तानसुखी होता है
चन्द्रमा की बारह राशि मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ एवं मीन राशी में स्थिति का फल
गेहूँ की अधिकारिणी राशि कुम्भ, सोना की मेष, मोती की मीन, चीनी की कुम्भ, चावल की मेष, ज्वार की वृश्चिक, रूई की मिथुन और चाँदी की कर्क है। जिस वस्तु की अधिकारिणी राशि से चन्द्रमा चौथा, आठवौं तथा बारहवाँ हो तो वह वस्तु तेज होती है, अन्य राशि पड़ने से सस्ती होती है।
शनि की महादशा अन्तर्दशा में खेती में वृद्धि हो, नौकर और भैसों की वृद्धि हो अर्थात् जातक अधिक नौकर और भैसें रखे।
सूर्य की महादशा अन्तर्दशा में राजा से अधिक यश मिले, धनागम हो, ज्वर और उष्णता के रोग हों, पिता के वियोग का भय हो। सूर्य अच्छा हो तो अच्छा फल लीजिये । सूर्य दुर्बल या दुःस्थान में हो तो अनिष्ट फल लीजिये।
लग्नेश/नवमेश/पंचमेश अस्त हों तो उनके रत्न अवश्य धारण करें। अष्टमेश, द्वितीयेश, सप्तमेश तथा लग्नेश अस्त या पापाक्रान्त हों तो वे अकाल मृत्यु तक दे सकते हैं। ऐसे ग्रहों की दशा में दान-पुण्य तथा शान्ति अनिवार्य है।
यदि किसी व्यक्ति के जीवन में अशुभ घटना उपस्थित होने लगे तनाव बढ़ने लगे , नींद ना आने की समस्या हो शरीर में कमजोरी महसूस होने लगे, वाद-विवाद होवे, खर्च बढने लगे, कमाई कम होने लगे, संतान संबंधी कष्ट, चर्म रोग, जोड़ों, घुटनों व रीढ़ की हड्डी में दर्द और रिश्तों में तनाव तो ये सब राहु केतु के कमजोर होने के संकेत है।
जब लाभेश लाभ-स्थान में हो तो व्यक्ति वक्ता, पंडित तथा कवि होता है।
चन्द्र, बुध, शुक्र, केतु व गुरु शुभग्रह हैं। सूर्य, मंगल, शनि और राहु उत्तरोत्तर अधिक पापीग्रह हैं।