सप्तमेश का फल

सप्तमेश लग्न अथवा सप्तम स्थान में हो तो व्यक्ति परस्त्रियों में लम्पट, दुष्ट, चतुर, धैर्यवान और सदा वातरोग से युक्त होता है।

सप्तमेश का फल

सप्तमेश का फल

सप्तमेश का फल

सप्तमेश लग्न अथवा सप्तम स्थान में हो तो व्यक्ति परस्त्रियों में लम्पट, दुष्ट, चतुर, धैर्यवान और सदा वातरोग से युक्त होता है।

सप्तमेश छठे अथवा आठवें स्थान में हो तो व्यक्ति रोगी, स्त्रियों का प्रिय, क्रोधी और हानि से युक्त होता है। उसको कभी सुख नहीं मिलता।

सप्तमेश धर्म अथवा धन-स्थान में हो तो व्यक्ति का अनेक स्त्रियों के साथ संगम होता है। वह व्यक्ति दीर्घसूत्री (ढीला) और स्त्रियों के ऊपर द्रव्य का व्यय करने वाला होता है।

जिस मनुष्य का सप्तमेश चतुर्थ अथवा दशम स्थान में हो, उसकी स्त्री पतिव्रता नहीं होती। वह व्यक्ति धर्मात्मा और सत्यभाषी होता है। वह प्राय: दंतरोग से पीडित रहता है।

जिस व्यक्ति का सप्तमेश तृतीय अथवा लाभ-स्थान में हो, उसके पुत्र नहीं जीते हैं। कदाचित् एक कन्या बच जाए; उपाय आदि करने से सम्भव है, पुत्र भी उत्पन्न हो जाए। ।

जिसका सप्तमेश द्वादश स्थान में हो, वह व्यक्ति दरिद्री और बड़ा कृपण होता है। उसकी स्त्री जार-कन्या होती है और वो वस्त्रों से अपनी आजीविका चलाता है तथा धनहीन होता है। इसी प्रकार जब सप्तमेश पंचम स्थान में हो तो व्यक्ति सदा हर्ष से युक्त, अभिमानी और सब प्रकार के अच्छे गुणों से युक्त होता है।

You are Viewing This Page of site https://rajyantra.com

Social Share

You might also like!