जन्म-कुण्डली में किस स्थान से क्या विचार करे

भाव का विचार करते समय यह देखना चाहिए कि उसमे छठे, आठवे, बारहवे भाव का स्वामी तो नहीं बैठा है। ६, ८, १२, भावों को दुस्थान कहते हैं। इनके स्वामी जहाँ बैठ जाये या ६, ८ या १२ भाव में किसी भाव का स्वामी बैठ जाये तो दोनों अनिष्ट-स्थिति अर्थात् खराब फल देने बाली स्थिति समझी जाती हैं।

जन्म-कुण्डली में किस स्थान से क्या विचार करे

जन्म-कुण्डली में किस स्थान से क्या विचार करे

यहाँ जन्म-कुण्डली में किस स्थान से क्या विचार करना यह बताया जाता है।

प्रथम भाव-
वेहं रूपं च ज्ञानं च वर्ण चैव बलाबलम् ।
सुखं दुखं स्वभावञ्च लग्नभावानिरीक्षयेत्॥
अर्थात् शरीर, रूप, ज्ञान, शरीर का रग, बलावल, सुख-दुख तथा स्वभाव का विचार प्रथम भाव से करना चाहिए।

द्वितीय भाव-
धनधान्यं कुटुम्बाश्च मृत्युजालममित्रकम्।
धातुरत्नादिकं सर्व धनस्थानान्निरीक्षयेत्॥
अर्थात् धन-धान्य, कुटुम्ब, मृत्यु, अमित्र (शत्रु आदि), धातु (सोना चाँदी आदि सम्पत्ति), रल आदि का विचार द्वितीय भाव से करना चाहिए। वाणी और विद्या का स्थान भी द्वितीय माना जाता है।

तृतीय भाव-
विक्रमं भृत्यभात्रादि चोपदेश प्रयाणकम्।
पित्रोर्वा मरणं विज्ञो दुश्चिक्याच्च निरीक्षयेत् ।। अर्थात् पराक्रम, नौकर, भाई (बहन) आदि, उपदेश, सफर करना (छोटी-मोटी यात्रा), माता-पिता की मृत्यु का विचार तृतीय से करना चाहिए।

चतुर्थ भाव-
वाहनान्यथ बन्धूच मातृसौख्यादिकान्यपि ।
निधि क्षेत्रं गृहं चापि चतुर्थात् परिचिन्तयेत्।।
अर्थात् सवारी, बन्धु, माता, सुख, निधि खेत, घर मकान आदि का विचार चतुर्थ से करना उचित है।

पंचम भाव-
यन्त्र-मंत्रो तथा विद्या बुद्धेश्चैव प्रबन्धकम्।
पुनराज्यापभ्रशादीन् पश्येत् पुत्रालयाद् बुधः।।
अर्थात् मंत्र, यन्त्र, विद्या, बुद्धि, प्रबन्ध (पुस्तक-लेखन आदि), पुत्र (कन्या भी), राज्यच्युत होना आदि का विचार पचम स्थान से करना चाहिए। इसे "पुत्र स्थान" भी कहते हैं।

षष्ठ भाव-
मातुलान्तकशंकानां शत्रुश्चैव व्रणादिकान् ।
सपत्नीमातरं चापि षष्ठभावान्निरीक्षयेत्॥
अर्थात् मामा, रोग, शत्रु, व्रण, सौतेली माँ आदि का विचार छठे स्थान से करना चाहिए । बहुत से लोग ऋण तथा नौकरी का विचार भी छठे से करते हैं।

सप्तम भाव-
जायामध्वप्रयाणं च वाणिज्यं नष्टवीक्षणम्।
मरणं च स्वदेहस्य जायाभावान्निरीक्षयेत्।।
अर्थात् स्त्री या पति, सफर (यात्रा), व्यापार, खोई हुई वस्तु, मारकता आदि का विचार सातवें से करना चाहिए। व्यापार आदि में जो साझेदारी में काम करे उनका विचार भी इसी स्थान से करना उचित है।

अष्टम भाव-
आयु रणं रिपुं चापि दुर्ग मृतधनं तथा ।
गत्यनुकादिकं सर्व पश्येद्रन्धाद्विचक्षणः।।
अर्थात् प्रायु, ऋण, शत्रु, किला, मरे हुए व्यक्ति का धन (वसीयत से प्राप्त या बीमा कम्पनी से प्राप्त), छिद्र आदि का विचार पाठवे से करना उचित है। क्लेश, अपवाद, मृत्यु, विघ्न, दाम, स्त्रियों का मांगल्य अर्थात् सौभाग्य का विचार भी इससे किया जाता है।

नवम भाव-
भाग्यं श्यालं च धर्म च भ्रातपत्नयादिकांस्तथा।
तीर्थयात्रादिकं सर्व धर्मस्थानानिरीक्षयेत् ।।
अर्थात् भाग्य, धर्म, भाई की स्त्री, तीर्थ-यात्रा, साले आदि का विचार नवम स्थान से करना चाहिए। गुरु तथा प्राचार्य का विचार भी इसी से किया जाता है। इस स्थान को "तपस्या" या "पुण्य" स्थान भी कहते हैं। उत्तर भारत के ज्योतिषी दशम भाव से पिता का विचार करते हैं। किन्तु दक्षिण भारत के ज्योतिषी नवम से पिता का विचार करते हैं।

दशम भाव-
राज्यं चाकाशवृत्ति च मानं चैव पितुस्तथा।
प्रवासस्य ऋणस्यापि व्योमस्थानानिरीक्षणम् ॥
अर्थात् राज्य, आकाश वृत्तान्त, सम्मान, पिता, प्रवास (दूसरे स्थान में रहना), ऋण, हुकूमत, औहदा, पद-प्राप्ति, व्यापार, कर्म, आज्ञा भादि का विचार भी दशम से किया जाता है।

एकादश भाव-
नानावस्तु भवस्यापि पुत्रजायाविकस्य च।
आयं वृद्धि पशूनां च भवस्थानानिरीक्षणम्।।
अर्थात् अनेक वस्तु, आय, लाभ, पुत्रवधू, वृद्धि तथा पशुऔ का स्थान, प्राप्ति, प्रशसा आदि का विचार ग्यारहवे से करना उचित है।

व्यय स्थान-
व्ययं च वैरिवृत्तान्त-रि:फमन्त्यादिकं तथा।
व्ययाच्चैव हि ज्ञातव्यमिति सर्वत्र घीमता ॥
अर्थात व्यय, खर्चा, शत्रुमों का वृत्तान्त, गुप्त शत्रु, वाम नेत्र, दुख, पैर, खुफिया पुलिस, चुगलखोर, दरिद्रता, पाप शयनसुख आदि का विचार, बारहवे से करे।

भाव-सम्बन्धी विशेष विचार-
भाव का विचार करते समय यह देखना चाहिए कि उसमे छठे, आठवे, बारहवे भाव का स्वामी तो नहीं बैठा है। ६, ८, १२, भावों को दुस्थान कहते हैं। इनके स्वामी जहाँ बैठ जाये या ६, ८ या १२ भाव में किसी भाव का स्वामी बैठ जाये तो दोनों अनिष्ट-स्थिति अर्थात् खराब फल देने बाली स्थिति समझी जाती हैं।

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