स्वास्थय एवं खान पान संबंधी प्रचलित कहावतें

स्वास्थय-एवं-खान-पान-संबंधी-प्रचलित-कहावतें 'भोर का खीरा हीरा, दोपहर का खीरा मीरा, शाम का खीरा पीरा' अर्थात् खीरा का उपयोग प्रात: काल जलपान के रूप में ही श्रेष्ठ है।

स्वास्थय एवं खान पान संबंधी प्रचलित कहावतें

स्वास्थय एवं खान पान संबंधी प्रचलित कहावतें

स्वास्थय एवं खान पान संबंधी प्रचलित कहावतें 


नींबू की उपयोगिता संबंधी कहावत 

भोजन की वस्तुओं में इसका रस मिला देने से न केवल उनका स्वाद ही बढ़ जाता है; वरन् भोजन पाचक, सुगन्धियुक्त और गुणप्रद हो जाता है। नींबू की उपयोगिता के विषय में एक देहाती कहावत है

खाय कागजी नींबू रोज, तुलसी बिरवा रोपै ।
बंद, पसारी करम क झखें, घर माँ मौत न कोपै ।।

नींबू में सबसे बड़ी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसकी खटाई पेट में जाकर खटाई का असर नहीं पैदा करती ; इसलिए इसकी गिनती खटाई में न करनी चाहिए।


जब भुख, हित भुख, मित भुख अर्थात् जब खुल कर भूख लगे तब हितकारी भोजन मित मात्रा में (न अधिक न कम) करना चाहिये।

प्रातः मूली अमिय मूरि, दोपहर में मूली मूली, रात में मूली सूली

छोटी पतली चूँच वाली मूली चरपरी, गर्म, पेट, गुर्दे, बवासीर, पीलिया, जिगर, तिल्ली के लिये हितकर व त्रिदोषों को मिटाने वाली है। रात्रि में रखी मूली का सेवन प्रात: काल में विशेष लाभप्रद है। बाद में जल न लें । इसके विपरीत मोटी बड़ी मूली चरपरी नहीं होती है, परन्तु त्रिदोष कारक होती है। अत: बड़ी मूली को घी या तेल में भून कर ही सेवन करना चाहिये। इससे उसका त्रिदोष पैदा करने वाला दोष समाप्त हो जाता है।

'भोर का खीरा हीरा, दोपहर का खीरा मीरा, शाम का खीरा पीरा'
अर्थात् खीरा का उपयोग प्रात: काल जलपान के रूप में ही श्रेष्ठ है।

चैते गुड़, वैशाखे तेल, जेठ रास्ता (धूप में चलना) असाढ़े बेल, श्रावण शाक ( पत्तियां), भादों मही, क्वार करेला, कार्तिक दही, अगहन जीरा, पूसै धना (स्त्री संग), माघ मिश्री, फाल्गुन चना, इन बारहों से बचे जो भाई ता घर वैद्य कभी नहिं जाई,
अतः जहाँ तक बन सके इन दिनों में यह सेवन नहीं करने चाहिये।



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