गुरु की शांति के विविध उपाय-guru-shanti

गुरु की शांति के विविध उपाय-guru-shanti
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गुरु की शांति के विविध उपाय


गुरु के कारण उत्पन्न समस्त अरिष्टों के शमन के लिए रुद्राष्टाध्यायी एवं शिवसहस्त्र नाम का पाठ अथवा नित्य रुद्राभिषेक करना अमोघ है।
 
वैदिक या तान्त्रिक गुरु मंत्र का जप तथा कवच एवं स्त्रोत पाठ अथवा भगवान दत्तात्रेय के तांत्रिक मंत्र का अनुष्ठान भी लाभप्रद है।

सौभाग्यवश जो लोग किसी समर्थ गुरुदेव की चरण-शरण में हैं, वे नित्य गुरु पूजन एवं गुरुध्यान करने से समस्त भौतिक एवं अभौतिक तापों से निवृत्त हो जाते है। 

प्रश्नमार्ग के अनुसार गुरु महाविष्णु का प्रतिनिधित्व करता है अत: कम से कम पुरुष सूक्त का जप और हवन अथवा सुदर्शन होम भी कल्याणकारी है। अधिक न कर सके, तो मासिक सत्य नारायण व्रत कथा एवं गुरुवार तथा - एकादशी का व्रत ही कर लें।

राहु मंगल आदि क्रूर एवं पाप ग्रहों से दूषित गुरु कृत "संतानबाधा योग" में शतचंडी अथवा हरिवंश पुराण एवं संतान गोपाल मंत्र का अनुष्ठान करें। 

ब्राहाण एवं देवता के सम्मान, सदाचरण, फलदार वृक्ष लगवाने एवं फलों के दान (विशेषकर केला, नारंगी आदि पीले फल) से बृहस्पति देव प्रसन्न होते है।

पंचम भाव स्थित शनि गुरु के अरिष्ट शमनार्थ 40 दिन तक वट वृक्ष की 108 प्रदक्षिणा करना बहुत हितकारी होता है। 

जिन स्त्रियों के विवाह में गुरु कृत बाधा से विलम्ब सूचित हो, उन्हें उत्तम पुखराज धारण करना चाहिए तथा केला या पीपल वृक्ष का पूजन करना चाहिए। 

गुरु को बलवान करने एवं धन प्राप्ति हेतु पुखराज युक्त "गुरुयत्र" धारण करें।

चमेली के पुष्प (9 अथवा 12) लेकर उन्हें जल में प्रवाहित करें।

पीले कनेर के पुष्प गुरु प्रतिमा पर चढ़ाएं।

13 अथवा 21 गुरुवार का व्रत रखे। 

गुरु लीलामृत का पाठन अथवा श्रवण करें। 

दत्त भगवान का विधिवत् पूजन करें।

कुछ स्वर्ण का दान करें-सिफ गुरुवार के दिन ही। 

स्वर्ण जल का पान करें। "स्वर्ण-जल" से तात्पर्य ऐसे जल से है जिसमें स्वर्ण को डुबोया गया हो। 

पीत वस्त्रों का दान किसी सौभाग्यवती को दें। 

"स्वर्ण-जल " से स्नान करें। 

गुरु के होरा में निर्जल रहे। 

मिथुन या कन्या लग्न में गुरु छठे, आठवें या बारहवें स्थान में हो तो गुरु के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए शुद्ध सोने के दो टुकड़े या पुखराज रत्न बराबर वजन के ले। विवाह समय एक टुकड़ा संकल्पपूर्वक नदी में बहा दें तथा दूसरा अपने पास रखें। जब तक दूसरा टुकड़ा जानक के पास रहेगा उसको गुरु का कुप्रभाव स्पर्श नहीं कर पाएगा तथा उसका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा।
बृहस्पतिवार का व्रत 5 या 11 या 43 बार रखना चाहिए। 

हरि पूजन करना या पीपल का पालन करना चाहिए। 

श्री विष्णु भगवान को नमस्कार करना। 

पुखराज पहनना, पुखराज के अभाव में हल्दी की गट्टी पीले रंग के धागे में बांध कर दायी भुजा पर बांधना। 

चादी की कटोरी में केसर/हल्दी का तिलक करना। 

शुद्ध सोना धारण करना ( गुरु षष्ठ भाव को छोड़कर)।

नाभि (धुनो) पर केसर लगाना या केसर खाना। 

ब्राह्मण कुल पुरीहित या साधु की सेवा करना। 

गरुड़ पूजा (गरुड़ पुराण) का पाठ करना। 

घर की दीवारों पर पीला रंग करना। 

पीले फूल (गेंदा या सूरजमुखी ) लगाना। 

गुरु उच्च का हो तो गुरु की चीजों का दान न देना।

गुरु नीच का हो तो गुरु की चीजों का दान न लेना।

गुरु की महादशा - अन्तर्दशा का फल जानने के लिए  https://rajyantra.com/blog/guru-mahadasha-antardasha