ग्रहरोग एवं दुर्घटनायें

गुरु हृदय से सम्बन्धित दुर्घटनायें का कारक है। यह आकाशीयतत्त्व से निर्मित मध्यम कद वाला जलीय ग्रह है। इसे गुरु भी कहा जाता है। यह वीर्य, रक्तप्रणाली, यकृत, त्रिदोष, कफ आदि को प्रभावित करता है। इसके निर्बल होने पर मज्जा के सत्त्व में विकार, यकृतरोग, उदररोग, मस्तिष्क विकार, प्लीहा रोग, स्थूलता, दन्तरोग, आलस्य, वायुविकार, मानसिक तनाव आदि उत्पन्न होते हैं।

ग्रहरोग एवं दुर्घटनायें

ग्रहरोग एवं दुर्घटनायें

ग्रहरोग एवं दुर्घटनायें

विभिन्न ग्रह विभिन्न प्रकार के रोगों आदि की उत्पत्ति के कारक का काम करते हैं। इनके क्षेत्र एवं प्रभाव इस प्रकार हैं

१. सूर्य - यह अग्नितत्त्व से निर्मित (ऊर्जातत्त्व) मध्यम कद वाला शुष्क ग्रह है। यह पुरुषों के दायें एवं स्त्रियों के बायें शरीर पर प्रभाव डालता है। इसके बली होने पर नेत्र आयु, अस्थि, सिर, हृदय, प्राणशक्ति, रक्त, मेदा एवं पित्त पर प्रभाव डालता है। अपमान से उत्पन्न ग्लानि से युक्त दुर्घटनायें।

२. चन्द्रमा - यह जलीयतत्त्व से निर्मित दीर्घ कद वाला ग्रह है। यह पुरुष के बायें एवं स्त्री के दायें भाग को प्रभावित करता है। इसके बली होने पर रक्तसंचार, उत्साह, मानसिकशक्ति, बायें प्राणवायु आदि की वृद्धि होती है। इसके निर्बल होने पर उत्साहहीनता, रक्तसंचार में मन्दता, कफरोग, पीलिया, वातरोग, नासिकारोग, मूत्रविकार, जलोदर, मुखरोग आदि की वृद्धि होती है। इसके निर्बल होने पर मानसिक रोग भी हो सकते हैं। चन्द्रमा का प्रभाव शरीर में पुरुषों के बायें नेत्र, वक्ष, फेफड़े एवं उदर, मूत्राशय, वामरक्त प्रवाह, रसधातु शारीरिकशक्ति, मन तथा मस्तिष्क पर पड़ता है। स्त्रियों में यह प्रभाव दायीं ओर पड़ता है। मस्तिष्क दोष से उत्पन्न हुई दुर्घटनायें।

३. मंगल - यह अग्नितत्त्व से निर्मित छोटे कद वाला ग्रह है। यह कपाल, कान, मडा, स्नायु पुढे, शारीरिकशक्ति, धैर्य, पित्त, दाह, शोध, क्रोध, मानसिक तनाव आदि को प्रभावित करता है। इसके निर्बल होने पर रक्तविकार, उच्च रक्तचाप, रक्तस्त्राव व कुष्ठ, रक्तविकार से उत्पन्न फोड़े-फुन्सी, चोट, सूजन वात एवं पित्त विकार, महामारी से ग्रसित होने की स्थिति, दुर्घटनायें एवं दुर्घटनाओं से उत्पन्न रोग, गुप्त रोग, अग्निदाह, आदि में वृद्धि होती है। उत्तेजना आवेग के कारण हुई दुर्घटनायें।

४. बुध - यह पृथ्वीतत्त्व से निर्मित सामान्य कदवाला जलीयग्रह है। यह जिह्वा, वाणी, स्वर, श्वास, ललाट, मज्जा के तन्तुओं, फुफ्फुस, केश, मुख, हाथ आदि को प्रभावित करता है। इसके निर्बल होने पर मानसिक रोग, हिस्टिरिया, चक्कर, निमोनिया, जटिल प्रकार के ग्वर, पीलिया, उदरशूल, मन्दाग्नि, वाणीविकार, कण्ठ के रोग, नासिका के रोग, स्नायुरोग आदि होते हैं। मतिभ्रम एवं अज्ञानतावश हुई दुर्घटनायें।

५. बृहस्पति - यह आकाशीयतत्त्व से निर्मित मध्यम कद वाला जलीय ग्रह है। इसे गुरु भी कहा जाता है। यह वीर्य, रक्तप्रणाली, यकृत, त्रिदोष, कफ आदि को प्रभावित करता है। इसके निर्बल होने पर मज्जा के सत्त्व में विकार, यकृतरोग, उदररोग, मस्तिष्क विकार, प्लीहा रोग, स्थूलता, दन्तरोग, आलस्य, वायुविकार, मानसिक तनाव आदि उत्पन्न होते हैं। हृदय से सम्बन्धित दुर्घटनायें।

६. शुक्र - यह जलीयतत्त्व से निर्मित मध्यम कद वाला ग्रह है। यह जननेन्द्रिय की सबलता, कामशक्ति, शुक्राणु, नेत्र, कपोल, ठुड्डी, गर्भाशय, संवेग (आवेश) आदि को प्रभावित करता है। इसके निर्बल होने पर वीर्य सम्बन्धी दुर्बलता, यौनशक्ति एवं कामशक्ति की दुर्बलता, जननेन्द्रिय दुर्बलता, जननेन्द्रिय विकार, यौनरोग, नशे से उत्पन्न विकार, विषप्रभाव, प्रमेह, उपदंश, प्रदर, पीलिया, कफरोग, वायुरोग आदि होते हैं। कामभाव एवं लालचवश किये गये कर्मों से उत्पन्न दुर्घटनायें।

७. शनि - यह वायुतत्त्व वाला, मस्तिष्क, रक्त, त्वचा, वात आदि को प्रभावित करता है। इसके दुर्बल होने पर पशुओं से हुई शारीरिक क्षति; सर्प, कुत्ते, कीड़े-मकोड़े के काटने, दम्मा, अंग-भंग, दुर्घटनायें, निराशा का आवेग, मानसिक अन्तुलन, आत्महत्या, हत्या, अपराधिक प्रवृत्ति से उत्पन्न दुर्घटनाओं से प्रभावित होता है। दुर्भाग्यवश एवं आकस्मिक संकट के रूप में आयी दुर्घटनायें।

८. राहु - यह वायुतत्त्व से निर्मित मध्यम कद वाला ग्रह है। यह मस्तिष्क, रक्त, वायु आदि को प्रभावित करता है। इससे मृगी, मानसिक विक्षिप्तता, चेचक, कृमि प्रकोप, सर्पदंश, पशुओं से दुर्घटना, कुष्ठ, कैंसर आदि होते हैं। षड्यंत्र के फलस्वरूप उत्पन्न दुर्घटनायें। यह षड्यंत्र अपना भी हो सकता है, शत्रु का भी।

९. केतु - यह वायुतत्त्व से निर्मित छोटे कद वाला ग्रह है। यह रक्त, त्वचा एवं वात को प्रभावित करता है। इसके निर्बल होने पर शरीर की श्रमशक्ति, प्रतिरोधशक्ति, सक्रियता आदि निर्बल होती हैं। इससे उत्पन्न रोग भी प्रभावित करते हैं।

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