शिक्षा व्यवसाय योग

चन्द्र, गुरु और लग्न शनि से दृष्टि हो, नवम में गुरु हो और कोई राजयोग भी हो तो विशिष्ट विद्वान बनता है।

शिक्षा व्यवसाय योग

शिक्षा व्यवसाय योग

विद्या प्राप्ति के योग



बली अष्टमेश व तृतीयेश किसी भाव में बैठे हों तो वैज्ञानिक, अनुसन्धानकर्ता, आविष्कारकर्ता होता है। 

धनेश व धन भाव का सम्बन्ध पंचमभाव व शुक्र से हो तो संगीतज्ञ होता है। 

सूर्य बुध का योग हो पंचमेश अथवा धनेश से सम्बन्ध हो, तथा मंगल से युत दृष्ट हो तो इंजीनियर या टैक्निकल ज्ञान होता है। 

शनि तथा बुध परस्पर सप्तम भाव में हो तो इन्जीनियर बनता है। 

शनि, शुक्र की युति से सिविल इन्जीनियर होता है। 

चन्द्र मंगल शनि तीनों दशम में या चतुर्थ में हो तो सिविल इन्जीनियर बनता है। 

चन्द्र लग्न व जन्म लग्न से पंचम स्थान का स्वामी बुध, गुरु, शुक्र के साथ केन्द्र त्रिकोण व एकादश में होने से विशिष्ट विद्वान होता है। 

चतुर्थेश और पंचमेश दोनों दशम स्थान में हो तो विद्वान होता है। 

बुध स्वगृही नवमांश का द्वितीय स्थान में हो, चतुर्थेश स्वगृही नवमांश का और पंचमेश एकादश भाव में दोनों बहुत बड़ा यशस्वी वक्ता होता है। 

बुध और गुरु का योग अथवा अन्योन्य दृष्टि होने पर जनता व राजद्वार में बहुत सम्मान दिलाता है। 

चतुर्थेश और बुध, शुक्र के लग्नस्थ होने पर विद्या प्राप्त कर विख्यात होकर यदि तीनों की नवमांश कुण्डली में स्थिति उत्तम हो तो चार चांद लग जाते हैं। 

चतुर्थेश चतुर्थ में और लग्नेश लग्न में होने पर विद्या द्वारा यश की प्राप्ति होती है। 

चतुर्थेश लान में लानेश चतुर्थ से होने पर भी विद्या द्वारा यश की प्राप्ति होती है। 

चतुर्थ भावस्थ चतुर्थेश पर शुभ ग्रहों से दृश्य होने पर विद्वान। 

चतुर्थेश 6,8,12वें हो गथना गागग्रहों के साथ हो या उनरो दृश्य हो तो विद्याध्ययन विघ्नबाधा पूर्वक होता है। 

बुध स्वगृही अथवा उच्चस्थ चतुर्थ भाव में होने से विद्या-वाहन-सम्पत्ति तीनों ही प्राप्त होती है। 

यदि पंचम स्थान का स्वामी बुध शुभयुक्त दृश्य हो, बुध उच्चस्थ हो। बुध पंचमस्थ हो। पंचमेश का नवमांशधिपति केन्द्र में हो और शुभ ग्रह से दृश्य हो। इन योगों में उत्पन्न व्यक्ति बुद्धिमान होता है। 

पंचमेश जिस भाव में हो उसका स्वामी शुभ दृश्य अथवा उसके दूसरे और 12 वें शुभग्रह हो तो बुद्धिमान होता है। 

गुरु पंचमस्थ हो उसके द्विादृश में शुभग्रह हो ओर बुध दोष रहित होने पर बुद्धिमान होता है। 

लग्नेश नीच राशि का हो अथवा पापयुत दृश्य हो तो श्रेष्ठ बुद्धि नहीं होती। पंचम भाव गावेश गाणयुत दृश्य हो शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो सारण शक्ति कमजोर होती है। बलवान गुरु व द्वितीयेश पर सूर्य, शुक्र की दृष्टि से व्याकरण शास्त्रज्ञ होता है। बली गुरु द्वितीयेश हो और सूर्य के साथ होकर अस्त नहीं हो तो व्याकरण शास्त्रज्ञ । बुध द्वितीय भावेश गुरु के साथ केन्द्र में हो में हो अथवा शुक्र स्वगृही या उच्चस्थ हो गणितज्ञ होता है। 

मंगल दूसरे भाव में शुभ ग्रह के साथ हो और बुध से दृश्य हो अथवा बुध केन्द्र में हो तो गणितज्ञ होता है। 

चन्द्र, बुध केन्द्र में हो अथवा तृतीयेश बुध के साथ केन्द्र में हो तो गणितज्ञ। गुरु द्वितीय भाव में हो ओर शनि से बुध षष्ठस्थान में हो तो फलितज्ञ होता है। द्वितीयेश सूर्य या मंगल हो उस पर गुरु की दृष्टि हो अथवा शुक्र की दृष्टि हो तो शास्त्रज्ञ होता है। 

चन्द्र, गुरु और लग्न शनि से दृष्टि हो, नवम में गुरु हो और कोई राजयोग भी हो तो विशिष्ट विद्वान बनता है। 

गुरु केन्द्र त्रिकोण गत होने से वेदान्ती बनता है। 

शुक से पंचम स्थान का स्वामी केन्द्र त्रिकोण में हो तो ग़न्थों का अनुवाद करने वाला होता है। 

द्वितीयेश बुध, गुरु के साथ होने से प्रभावशाली व्याख्याता। 

बुध और गुरु अपने अपने नवमांश में होकर द्वितीय भाव स्थित होने से मधुरभाषी योग बनता है। 

गुरु नवम में चन्द्र और शनि से दृश्य होने पर विदेश में वकालत करता है अथवा नवम में मंगल शुक्र की युति हो तो चन्द्र, बुध की युति नवम में श्रेष्ठ वक्ता बनाती है। बुध केन्द्र में द्वितीयेश बली हो। शुक्र द्वितीय में, तृतीय में शुभ ग्रह। 

उच्चस्थ और द्वितीयेश बली हो। इन तीनों योगों में ज्योतिष शास्त्रज्ञ। 

बुध केन्द्र में शुक्क ५वें द्वितीयेश बली होने पर ज्योतिषशास्त्रज्ञ योग बनाता है। रवि या मंगल धनेश होकर गुरु अथवा शुक्र से युत दृश्य होने पर तर्ककर्ता बनता है। 

बुध जिस भाव में हो उससे पंचमाधिपति यदि केन्द्र त्रिकोण में शुभ ग्रह युक्त हो तो तर्कशास्त्री बनता है। 

तृतीय स्थान बली हो वह बुध या गुरु से दृश्य हो या युत हो अथवा बुध गुरु तृतीयस्थान से केन्द्र में हो इन दोनों योगों में कंठ स्वर अत्यंत मधुर होता है। 33. दशमेश चतुर्ष में और शुक्र उच्च नवमांश में हो अत्यन्त संगीत प्रिय होता है। 

नवमेश और दशमेश चतुर्थस्थ हो और कोई केन्द्रेश त्रिकोणगत हो तो संगीत सामग्री संग्रहकर्ता होता है। 

लग्नेश पंचम में दशमेश चन्द्र पापग्रह के साथ केन्द्र में होने से संगीत प्रिय होता है। सूर्य आत्मकारक के नवमांश में हो अथवा आत्मकारक से पंचम रवि हो तो संगीतज्ञ होता है। 

चन्द्र बुध के नवमांश में शुक्र से दृश्य हो तो संगीतज्ञ बनता है। श+ च अथवा बुध, शुक्र के योग से संगीतज्ञ।११वे शुक्र संगीत से धन प्राप्ति।

द्वितीयेश उच्चस्थ दशम में दशमेश द्वितीयस्थ मित्र की राशी में होने से द्वितीग और चतुर्थ में अन्योन्य संबंध हो दशमस्थ बुध और शुक्र होने पर परीक्षा में पूर्ण सफलता मिलती है। 

शुभ ग्रह की दृष्टि रहित शनि द्वितीय में अथवा दशम में होने से विघ्नबाधा पूर्वक शिक्षा प्राप्त होती है। द्वितीयेश षष्ठभाव में दशमेश द्वादश में दोनों पाप दृश्य होने पर विद्या में सफलता नहीं मिलती। 

द्वितीयेश केन्द्रगत गुरु से दृश्य हो गुरु बली होकर दशम स्थान जो उसका स्वगृही है उसे देखता हो तो उच्च शिक्षा प्राप्त होती है तथा छात्रवृत्ति मिलती है।

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